मां क्षिप्रा
मां क्षिप्रा आरती
मां क्षिप्रा महाआरती का आयोजन किसी निश्चित दिन पर किया जाता है, जिसे मंदिर के पंडितों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। रामघाट क्षिप्रा नदी का सबसे लोकप्रिय और प्राचीन घाट है।
सिंहस्थ कुम्भ मेले के दौरान लोग इस पवित्र घाट पर आस्था की पवित्र डुबकी लगाने के लिए आते है। इस घाट को क्षिप्रा नदी का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। क्षिप्रा नदी और उज्जैन के इतिहास में रामघाट का विशेष महत्व है।
क्षिप्रा महाआरती को बढ़ावा देने और इसे बड़े पैमाने पर आयोजित करने के लिए उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड में हाल ही में एक योजना बनाई है इसके तहत भिन्न-भिन्न समय पर इस आयोजन को बड़े स्तर पर किया जायेगा। कुछ समय पहले रामघाट पर बड़े स्तर पर क्षिप्रा महाआरती का अयोजन किया गया था, जिसमें स्थानीय प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए मलखंभ की भी प्रस्तुति आयोजित की गई थी।
इस परियोजना के लिए 1 करोड़ रूपए की लागत राशि तय की गई है। यह कार्यक्रम किसी विशेष निर्दिष्ट दिन आयोजित किया जायेगा। अब तक इस तरह के कुल 06 कार्यक्रम आयोजित किये जा चुके है, इस आयोजन की प्रारंभिक फंडगि उज्जैन स्मार्ट सिटी द्वारा की जाएगी बाद में इस आयोजन में को-फंडिग की व्यवस्था भी की जाएगी, जो कि अभी विकास के चरण में है।
मोक्ष दायिनी माँ क्षिप्रा
एक किंवदध्न्ति के अनुसार उज्जयिनी में अत्रि ऋषि ने तीन हजार साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों के ऊपर ही उठाए रखा अपनी तपस्या पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने अपने नेत्र खोले तब देख कि उनके शरीर से प्रकाश के दो स्त्रोत प्रवाहित हो रहे है
- पहला आकाश की ओर गया और चन्द्रमा बन गया और दूसरे ने जमीन पर क्षिप्रा नदी का रूप धारक किया।
क्षिप्रा को सोमवती के नाम से भी जाना जाता है। एक रोचक कथा यह भी है कि एक बार जब महाकालेश्वर को भूख लगी तो उसे शान्त करने के लिए उन्होंने भिक्षा माँगने का निश्चय किया। बहुत दिनों तक जब उन्हें भिक्षा नहीं मिली तब उन्होंने भगवान विष्णु से भिक्षा चाही। विष्णु ने उन्हें अपनी तर्जनी दिखा दी। इस पर शंकर ने क्रोधित होकर उस तर्जनी को त्रिशूल से भेद दिया। उस अंगुली से रक्त प्रवाहित होने लगा तब शिव ने उसके नीचे कपाल कर दिया। कपाल के भर जाने पर जब वह नीचे प्रवाहित होने लगा उसी से क्षिप्रा जन्मी।
अनेक कथाओं की जननी ऐसी क्षिप्रा ने उज्जयिनी को तीन तरफ से घेर रखा है। वह दक्षिण-पूर्वी छोर से नगर में प्रवेश करती है। फिर वह हर स्थान व मोड़ पर मनोहारी दृश्य स्थापित कर लेती है। त्रिवेणी का तट हो या चिन्तामण गणेश की ओर जाने का मार्ग, वहाँ क्षिप्रा की सुन्दर मंगिमा के दर्शन होते है।
महाकाल तथा हरसिद्धि के आशीर्वाद से वह अभिशक्त होती है और भगवान महाकाल के समक्ष उसकी उत्ताल तरंगें मानी नर्तन करती है और दुर्गादास की दत्री की और बढ़ते हुए वह चक्रतीर्थ पर काशी के मणिकर्णिका घाट का स्मरण कराती है, वह भर्तृहरि गुफा, मछिन्दर, गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पार कर सांदीपनी आश्रम और राम जनार्दन मंदिर को निहार कर मंगलनाथ पहुँचती है तथा इस मार्ग में वह गंगाघाट से गुजरती है। आगे बढ़कर वह सिद्धवट की और मुड़ती है और फिर कालियादेह महल को घेरती है।
क्षिप्रा का यह रूप युगों से तपस्वियों को आकर्षित करते आया है और वे तट इतिहास में अमर हो गए है।
क्षिप्रा के किनारे 28 प्रमुख तीर्थ है। इनमें कर्कराज, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमुक्ति तीर्थ, गन्धर्व तीर्थ, केदार तीर्थ, सोमतीर्थ, चक्रतीर्थ, कालभैरव तीर्थ, मंगल तीर्थ और शक्ति भेद तीर्थ मुख्य है।
